आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तूफानों के भँवर में, क्यों थामी मेरी पतवार

                
                                                         
                            तूफ़ानों के भँवर में, क्यों थामी मेरी पतवार,
                                                                 
                            
लगता है कुछ हिसाब बाकी है, पिछले जन्म का उधार।
जब साहिल भी रूठ गया था, लहरें थीं तलवार लिए,
तूने ही तो थाम लिया था, डूब रही थी मेरी नाव भँवर में।

कौन-सा रिश्ता जोड़ गया तू, कैसी डोर पुरानी है,
तेरी मेरी राहों में क्यों, सदियों की कहानी है।
मिलना भी कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं, बिछड़ना भी बेकार नहीं,
लगता है इन साँसों पर अब भी, किसी जन्म की निशानी है।

जब अपने भी साथ छोड़कर, मुँह मोड़ किनारे हो गए,
हम दर्दों की आग में जलकर, ख़ुद से भी बेगाने हो गए।
तू आया बनकर मौज कोई, या रब की रहमत बनकर,
हम डूब रहे थे बीच भँवर में, तूने हाथ बढ़ाए थे।

अब सोचूँ तो दिल कहता है, कुछ क़र्ज़ पुराना होगा,
तेरा मेरा मिलना शायद, कोई अधूरा फ़साना होगा।
किस जन्म में वादा करके हम, इस जन्म तलक आए हैं,
किस्मत की इस किताब में शायद, नाम हमारा लिखा होगा।

अब पतवार तेरे हाथों में, दरिया भी अपना लगता है,
तेरे संग हर मुश्किल रस्ता, मंज़िल जैसा लगता है।
अगर हिसाब चुकाना ही है, तो उम्र भर का साथ रहे,
कुछ क़र्ज़ उलफ़त के ऐसे हैं, जिन्हें निभाना अच्छा लगता है।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर