सितारों की बात बताकर, मुझे गुमराह मत करो,
मेरे सवालों से, यूँ बचने का हुनर अब मत करो।
पहले मेरी बात का, सीधा-सा जवाब दे दो,
किसके संग महफ़िल सजाई, ये राज़ तो खोल दो।
वहाँ जाने की ख़बर तक, तुमने मुझको दी नहीं,
पूछने पर सच कहोगे, ऐसी उम्मीद भी रही।
दोस्ती का वास्ता देकर, भरोसा जीतते रहे,
आज झूठ की ओट लेकर, किससे नज़रें चुराते रहे?
कौन थे वो दोस्त, जिनके संग पार्टी की थी,
किसलिए फिर, बात छुपाने की तुम्हारी ज़िद रही?
पार्टी करना ग़लत नहीं, ये बात मैं भी जानती हूँ,
पर छुपाकर झूठ बोलोगे, तो कैसे सच मानती हूँ?
मुझको चाँद-सितारे देकर, बात मेरी टालना नहीं,
मेरे सीधे सवाल को, किसी और ओर मोड़ना नहीं।
प्यार में आज़ादी भी है, भरोसे का मान भी,
सच अगर तुम कह न सके, फिर कैसा अरमान भी?
अब बहानों की ज़रूरत है, न क़िस्सों का जाल बुनो,
जो हुआ है साफ़ कह दो, सच से मुँह न फेरो।
रिश्ते झूठ से नहीं, विश्वास से सँवरा करते हैं,
दिल में जगह हो अगर, तो सच कहने से डरते नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
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