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कुछ रिश्तों का, वक्त से मिटाना आसान नहीं

                
                                                         
                            उस जगह को देखकर, क्यों नैन मेरे भर उठे,
                                                                 
                            
क्या वहीं कुछ ख़्वाब थे मेरे, जो बिखर उठे।
किसके क़दमों की आहटें थीं, उन राहों के दरमियाँ,
नाम तेरा लब पे आया, और लम्हे ठहर उठे।

जिस गली से गुज़रकर, कभी मुस्कुराते थे हम,
आज उसी गली में, क्यों आँसू बिखर उठे।
दीवारों से पूछता रहा, मैं उसके वजूद का पता,
ख़ामोशियों के बीच, कितने सवाल उभर उठे।

वो पेड़, वो छाँव, वो पत्थर पुराने से लगे,
जैसे बीते हुए दिन, फिर सामने आकर खड़े।
मैंने चाहा कि, न देखूँ उन निशानों की तरफ़,
पर यादों के क़ाफ़िले, फिर मेरे दिल में उतर पड़े।

धड़कनों ने आज, फिर कैसी बग़ावत कर दी,
बंद आँखों ने, तेरी तस्वीर की ज़िद कर दी।
जिस कहानी को, भुलाने में उम्र गुज़री थी,
उस जगह ने, फिर वही कहानी ताज़ा कर दी।

अब वहाँ मेरा कोई, अपना ठिकाना भी नहीं,
उन पुरानी यादों का, कोई बहाना भी नहीं।
फिर भी उस मोड़ पर आकर, दिल ठहर जाता है,
कुछ रिश्तों का, वक़्त से मिटाना आसान नहीं।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

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