सरसों के जब फूल खिलें हों, गेहूँ की बाली भी हो,
लहर-लहर जब हवा चले, मन में कोई हिलोर चले।
माटी की सौंधी ख़ुशबू से, जब सारा गाँव महकता हो,
पगडंडी पर चलते-चलते, दिल उस ओर चले।
आमों पर जब बौर लगे हों, कोयल मीठा गाती हो,
खेतों की हरियाली, मन में नई उमंग जगाती हो।
दूर कहीं पनघट पर, हँसती पायल की झंकार मिले,
सूने मन के आँगन में भी, अधरों पर कोई फूल खिले।
नदिया के जल में, चंदा अपनी चाँदी घोल रहा हो,
रात का आँचल, तारों से जब धीरे-धीरे डोल रहा हो।
चुपके से कोई याद पुरानी, मन के द्वार खड़काए,
सोया हुआ हृदय भी, फिर से कोई तरंग सुनाए।
खेतों में जब श्रम की पूजा, माथे पर अभिमान रहे,
हाथों में हल, आँखों में अपना हिंदुस्तान रहे।
पसीने की हर बूँद से, जब धरती सोना उगले,
मेहनत करने वालों के, घर खुशियों का संसार सजे।
ऋतुओं का यह रंग निराला, जीवन का शृंगार रहे,
हर चेहरे पर हँसी खिले, और हर मन में प्यार रहे।
सरसों, गेहूँ, खेत, खलिहान हमारी शान कहाएँ,
माटी से जो प्रेम करे, वो जीवन का अर्थ समझ पाए।
-रतन कुमार कैथवास
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