शोहरत पर नाज़ करने वाले ऐ नादान,
इस दौड़ में और भी थे क़ाबिल इंसान।
सज्दा कर 'उस कामिल' मुर्शिद को तू,
मौक़ा अता किया ग़ालिब तुझे समझकर!
न दे न्योता विनाश को अहंकार के नशे में,
बहुत कर ली नाफ़रमानी रज़ा-ए-पाक' की।
ले डूबेगा घमंड तुझे, 'करम' मिटने की देर है,
तरस जाएगा दो ग़ज ज़मीन तू उस दिन!
प्रीत है जहाँ, समरसता का अनुपम गहना,
न जला नफ़रत से, फूलों के इस चमन को।
बहर अज़ल से कायम, जिंदगी एक हबाब,
मिट गए ज़ालिम, मिटा न पाए कुदरत को!
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