जंगलों में लग रही आग,
बना है चिंता का विषय आज ।
जब तुमने जंगलों में आग लगाई होगी, तब सोचो यह प्रकृति कितनी रोई होगी,
चीख रही होगी रोई होगी किसी मासूम जानवर और उसकी मां की आत्मा,
और पूछ रही होगी कहां है तू परमात्मा ,
मत कर ये जुर्म है मानव चंद सिक्कों के लिए ,
क्यों हैवान बन गया है तू प्रकृति के लिए ,
खोल मन की आंखें जरा मूंद कर ये लोचन,
तू भी कहां बच पाएगा जो फैलाया है तूने चारों ओर ये मरण ,
यह जंगल ही तो देते हैं हमें हवा पानी और जीने का मूल मंत्र ,
तूने इन्हें जला कर दे दिया है अपने हैवान होने का प्रमाण पत्र,
कुछ नहीं बिगड़ा है यदि अभी भी सुधर जाएगा,
वरना देख कर प्रकृति का रौद्र रूप एक दिन तू भी पछतायेगा,
'माही' तो केवल इतना ही कहना चाहती है कि ---
धरती हमारी है जीवन हमारा है,
इसको सुधारना अपने ही द्वारा है,
टूट जाए ना जीवन की ये डोर ,
सुधारो उसे जो हमने बिगड़ा है।
-रचना चंदेल 'माही'
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