दिन ढल गया तेरी याद में इक नया जख्म खाना चाहता हूं मिटा कर अरमां मैं मरना चाहता हूं
रुला देती अक्सर हमें दिल की बेचैनियाँ मैं आकर पास तेरे अर्ज अब अदब से करना चाहता हूं
दिल मेरा तोड़ना कोई मुश्किल नहीं तेरे लिए मगर सर मेरा रहे सलामत तो दर्द कहना चाहता हूं
मिल कर तुमसे बिछड़ना भी इक हादसा था आकर तेरे पे जला के दिया इंतजार करना चाहता हूं
गर तू न मिला दिल से तो दर्द और बढ़ा लूंगा मैं अब तुमसे ही किस्सा ए गम कहना चाहता हूं
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