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अलविदा मोहब्बत

Alvida mohabbat
                
                                                         
                            अलविदा तुझको मोहब्बत तू मेरी जद में नहीं,
                                                                 
                            
मैं राह का फ़क़ीर एक तू महलों की जागीर है.......

पास कैसे आऊँ तेरे लग रहा है डर मुझे,
मैं बुत हूँ पत्थर से बना तू काँच की तस्वीर है........

तुझे एक दफा छूने की भी मुझमे हिम्मत है नहीँ,
मैं हूँ मिट्टी का गुबार तू मखमली महताब है......

रहने भी दो बज़्म ये मैं इसके काबिल हूँ नहीँ,
मैं गांव का गँवार एक तू शहरों की तहजीब है....

क्यों सताते हो मुझे करवा के गैरों से सामना,
मैं बदशक्ल इन्सान हूँ तू हुस्न की ताबीर है.......

छोड़ो मुझे जाने भी दो मैं तेरे लायक हूँ नहीँ,
मैं आतिश-ओ-अंगार हूँ तू मोम की गुड़िया सी है.......

कैसे चाहोगे मुझे, मैं तुझको पसन्द न आऊँगा,
मैं हूँ वीरान शख्सियत, तू है चश्म-ऐ-आईना.....

कैसे भला मैं कह दूं ये कि तू मेरे भी दिल में है,
बेरंग मेरी हैसियत तू रँगों की शब आप है......

तू भला माने न माने मैं तो हूँ ये जानता,
न दे सकूँगा जिन्दगी वो जिसकी तू हकदार है.......

तू भी अब हो जा खफ़ा कुछ और न कह पाऊँगा,
मैं गर्म रेती में पला तू बर्फ का पहाड़ है.......

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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