Urdu Poetry: गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी

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तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
- अल्लामा इक़बाल

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बदन में जैसे लहू ताज़ियाना हो गया है
उसे गले से लगाए ज़माना हो गया है
- इरफ़ान सिद्दीक़ी

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आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं
- साहिर लुधियानवी

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Urdu Poetry: टूट पड़ती थीं घटाएँ जिन की आँखें देख कर

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