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‘तालाब का मेंढक’ : बाल-साहित्य की संवेदनशील, ज्ञानवर्धक और पर्यावरण-सचेत दुनिया

पुस्तक समीक्षा
                
                                                         
                            (समीक्षा- डॉ . गोपेश्वर दत्त पाण्डेय ने लिखी है) 
                                                                 
                            
       
 जय प्रकाश पांडेय की बाल-कथा पुस्तक ‘तालाब का मेंढक’ ऐसी रचनाओं का संग्रह है, जिसमें बच्चों की सहज जिज्ञासा, कल्पनाशीलता और मनोरंजन को प्रकृति, पर्यावरण, देश-समाज, संस्कृति, विज्ञान तथा मानवीय मूल्यों से जोड़ा गया है। पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि लेखक बच्चों को उपदेश देने के बजाय कथा, संवाद, पात्रों और घटनाओं के माध्यम से उन्हें सोचने के अवसर देते हैं। पुस्तक में ‘चिड़िया और कछुआ’, ‘जासूस अंकल’, ‘पसुआ और नोमचा’, ‘तालाब का मेंढक’, ‘पुरी की रेल-यात्रा’ और ‘प्रतियोगिता’ जैसी विविध कथाएँ हैं। इनका संसार कभी लक्षद्वीप के समुद्र तक जाता है, कभी महानगर की कल्पनाओं में प्रवेश करता है, कभी सड़क किनारे खड़े पुराने पेड़ों की स्मृतियों में और कभी रेल-यात्रा के माध्यम से भारत की भौगोलिक-सांस्कृतिक विविधता में।

पुस्तक की विशिष्टता उसकी विषय-विविधता में निहित है। सामान्य बाल-कहानियों में जहाँ मनोरंजन और नैतिक शिक्षा प्रमुख रहती है, वहीं इस संग्रह में मनोरंजन के साथ ज्ञान और समकालीन सामाजिक सरोकारों का भी पर्याप्त स्थान है। ‘चिड़िया और कछुआ’ में लक्षद्वीप, समुद्री जीवन, मैंग्रोव और कोरल रीफ के माध्यम से बच्चों को समुद्री पारिस्थितिकी की दुनिया से परिचित कराया गया है। बिस्वास और मीठी की दोस्ती कथा को आत्मीयता देती है और समुद्र के प्रति बाल-मन में जिज्ञासा जगाती है। कोरल रीफ को न छूने की सीख पर्यावरण संरक्षण का सहज संदेश बन जाती है। यहाँ प्रकृति कोई निर्जीव पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कहानी का सक्रिय पात्र है।
‘पसुआ और नोमचा’ पुस्तक की पर्यावरणीय चेतना को और गहरा करती है। पीपल और नीम के वृक्षों को मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर लेखक ने विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन के प्रश्न को बच्चों के सामने रखा है। आजादी के समय से लेकर सड़क चौड़ीकरण, पेड़ों की कटाई, प्रदूषण और पुनर्वनीकरण तक की यात्रा इन वृक्षों की स्मृतियों के माध्यम से दिखाई गई है। पेड़ों का मनुष्यों और पक्षियों के साथ पुराना रिश्ता तथा आधुनिक विकास के कारण उस रिश्ते का टूटना भावनात्मक प्रभाव पैदा करता है। इस कथा का विशेष गुण यह है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल ‘पेड़ बचाओ’ के नारे तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि पेड़ को जीवन, स्मृति, छाया, आश्रय और सामाजिक संबंधों के केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

संग्रह की शीर्षक-कथा ‘तालाब का मेंढक’ अपेक्षाकृत अधिक गंभीर और मार्मिक है। मटरू और मुक्ता की मित्रता के माध्यम से कहानी शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे सड़क निर्माण और तथाकथित विकास के पर्यावरणीय दुष्परिणाम सामने आते हैं। तालाब में मलबा और रसायन गिरना, जीव-जंतुओं का मरना, यातायात से दुर्घटनाएँ, जलागम क्षेत्र का बाधित होना, तालाब का सूखना और अंततः मटरू की मृत्यु—ये घटनाएँ बच्चों को विकास की कीमत पर विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। कथा का अंत विशेष रूप से प्रभावशाली है क्योंकि मटरू की मृत्यु केवल एक मेंढक की मृत्यु नहीं रह जाती; वह प्रकृति के उस हिस्से का प्रतीक बन जाती है जिसकी उपेक्षा मनुष्य अपने विकास के नाम पर कर देता है। बाल-साहित्य में इतने स्पष्ट पर्यावरणीय प्रश्न को कथा के भीतर पिरोना इस संग्रह की उल्लेखनीय उपलब्धि है।
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2 घंटे पहले

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