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मेरी जवानी छीनी मेरी इज्जत

                
                                                         
                            ग़र बात मेरे गिरेबान तक होती तो ठीक था,
                                                                 
                            
मेरे बच्चों के बाप की गिरेबाँ खींची गयी,
उसे कैसे माफ़ कर दूँ मैं...
जिनका पूरा खानदान गिरवी है बाज़ार में,
उन्होंने मेरी नियत पर ऊँगली उठाई,
उसे कैसे माफ़ कर दूँ मैं....
मेरी जवानी छीनी मेरी इज्जत और मेरे बच्चे भी तुमने तो भी ठीक था,
पर बच्चों से बाप का साया छीना गया,
उसे कैसे माफ़ कर दू मैं...
मेरे गाँव मेरा घर भी छीना तुमने फिर भी जाने दिया तुझे,
पर मेरे बच्चों का हंसता-खेलता बचपन छीना,
उसे कैसे माफ़ कर दूँ मैं...
मेरी हँसी-ख़ुशी मेरा सब कुछ छीना तुमने,
पर मेरे बच्चों का घर छीना,
उसे कैसे माफ़ कर दूँ मैं...
चंद सिक्कों की खनक से पैरों में घुँघरू बांध कर नाचने वालों,
तुमने किसी शरीफ की इज्जत लूटी,
उसे कैसे माफ़ कर दू मैं...
-प्रमोद श्रीवास्तव साहित्य
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2 घंटे पहले

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