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विद्रोही ही निडर लगता है

                
                                                         
                            अरे काहे का डर लगता है,
                                                                 
                            
विद्रोही ही निडर लगता है.

खूब घूम ले दिल्ली-विल्ली,
अपना घर ही घर लगता है.

मौत की घंटी बज उठती है,
चींटी को जब पर लगता है.

महक उठते हैं बाग-बगीचे,
मिट्टी से जब जड़ लगता है.

जब किस्मत तेरे साथ नहीं,
उड़ के भी कंकड़ लगता है.

तन-मन बेचैन हो उठता है,
जो पीठ पे खंजर लगता है.
- प्रदीप विद्रोही
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

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