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मंजिल हमसे दूर नहीं है

                
                                                         
                            हुआ हौंसला चूर नहीं है,
                                                                 
                            
मंजिल हमसे दूर नहीं है.
दिल्ली को जा के कह दे,
वही खुदा का नूर नहीं है.

पीट-पीट के अपनी छाती,
हमें बुलाती गांव की माटी.
माटी से ही घर-द्वार बनती,
जा शहरों में कभी न तनती.
कभी ईंट हुई मगरुर नहीं है...

समझ गांव को शहरी बाबू,
यहां हकीकत यहां न जादू.
देख शहरी हवा हुई विषैली,
हर मन हुआ जहां बेकाबू.
यह सौदा मंजूर नहीं है...

एक दिन ऐसा भी लौटेगा,
शहर-गांव का भेद मिटेगा.
हर बाजी भारत जीतेगा,
क्रिकेट ही मशहूर नहीं है...

हिंदु-मुस्लिम,सिख,ईसाई,
हर मजहब में छुपा कसाई.
किस-किस पे विश्वास करोगे,
हर बंद मुट्ठी में दिया-सलाई.
बोली में शहद-गुड़ नहीं है...

बंद मुट्ठी अब राज नहीं है,
राजा के सिर ताज नहीं है.
किसके फतवे कैसे फतवे,
अब फतवा आगाज़ नहीं है.
नशे में विद्रोही चूर नहीं है...
- प्रदीप विद्रोही
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2 वर्ष पहले

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