आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज़मीं पाँव नीचे न सर आसमाँ मुहब्बत की बस्ती बसाएं कहाँ

                
                                                         
                            ज़मीं पाँव नीचे न सर आसमाँ
                                                                 
                            
मुहब्बत की बस्ती बसाएं कहाँ

नशे मन पे कैसी ये बिजली गिरी
नहीं आग का कोई नाम-ओ-निशाँ

मेरे पास तुमको मिलेगा भी क्या
ख़ला दिल जिगर है ख़ला है मकाँ

न तोड़ो यूं ग़ुन्चो को डाली से तुम
बिखेरो न गुल राह में गुल-फ़िशाँ

तुम्हें प्यार करना ही आता नहीं
चले देने हो इश्क़ का इम्तिहाँ

जवानी है पानी का इक बुलबुला
न कर हुस्न पर अब ज़ियादा गुमाँ

दवा बे असर है दुआ बे असर
लिखा इश्क़ में मौत है मेरी जाँ

बड़ी ख़ूबसूरत तेरी बज़्म है
मुसलसल सुख़न की बहे कहकशांँ

बुझाओ न उल्फ़त का तुम 'दीप' अब
दियों से ही रोशन है सारा जहाँ
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
46 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर