ज़मीं पाँव नीचे न सर आसमाँ
मुहब्बत की बस्ती बसाएं कहाँ
नशे मन पे कैसी ये बिजली गिरी
नहीं आग का कोई नाम-ओ-निशाँ
मेरे पास तुमको मिलेगा भी क्या
ख़ला दिल जिगर है ख़ला है मकाँ
न तोड़ो यूं ग़ुन्चो को डाली से तुम
बिखेरो न गुल राह में गुल-फ़िशाँ
तुम्हें प्यार करना ही आता नहीं
चले देने हो इश्क़ का इम्तिहाँ
जवानी है पानी का इक बुलबुला
न कर हुस्न पर अब ज़ियादा गुमाँ
दवा बे असर है दुआ बे असर
लिखा इश्क़ में मौत है मेरी जाँ
बड़ी ख़ूबसूरत तेरी बज़्म है
मुसलसल सुख़न की बहे कहकशांँ
बुझाओ न उल्फ़त का तुम 'दीप' अब
दियों से ही रोशन है सारा जहाँ
-प्रदीप तिवारी 'दीप'
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