आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मातृभाषा!... नायिका तूं संस्कृति की

                
                                                         
                            मातृभाषा को निनाद।
                                                                 
                            
ईश्वर को आय वरदान।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

होसे जहां मंगलगान।
संचारित होसे नव-प्राण।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

संस्कृति की तूं अधिष्ठान।
समाज की तूं अधिष्ठान।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

समाज की एका की प्राण।।
समाज को संगठन की प्राण।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

कोयल की वाणी समान।
अनुभूति देसे तोरो निनाद।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

राखी को बंधन समान।
जोड़न को से तोरो काम।
नायिका तूं संस्कृति की,
तूच संस्कृति को प्राण।।

-ओ सी पटले
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
17 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर