अब मरासिम तो नहीं फिर भी वो मेरा प्यार है
है मुहब्बत उसको भी पर होठों पे इनकार है
चाहने से टूटी कब है डोर चाहत की बता
होठों पर इनकार लेकिन दिल में तो इकरार है
शीशा-ए-दिल की तो क़िस्मत में लिखा है टूटना
जीत कर भी हर किसी के हिस्से आई हार है
प्यार अपना हो नहीं सकता है रिश्तों का कलंक
दोनों ही हालात के आगे रहे बेज़ार हैं
दिल में उल्फ़त का दिया जलता रहेगा उम्र भर
मेरे ज़िंदा रहने का इकलौता ये आधार है
प्यार ये ज़िंदा रहेगा उसका भी 'पारुल' सदा
पर जुदा इक दूजे से चाहत का ये संसार है
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