हर बशर ख़ुद से ही ख़फ़ा सा है
ज़िन्दगी से हुआ जुदा सा है
बाँटे क्या प्यार इस जहां में कोई
जब हसद का ही सिलसिला सा है
आज पैसा ख़ुदा है बन बैठा
पेड़ रिश्तों का सूखता सा है
किससे उम्मीद प्यार की करें हम
प्यार का नाम लापता सा है
फ़न नहीं आदमी में है कोई
जाने किस बात का नशा सा है
हम भटकते हैं दर-ब-दर 'पारुल'
ज़िन्दगी में नहीं मज़ा सा है
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