आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कैसा ज़माना आ गया

                
                                                         
                            आज कैसा ये ज़माना आ गया
                                                                 
                            
झूठ को अब सच बनाना आ गया

हाल अपना अब नहीं कह पाते हैं
दर्द हमको भी छुपाना आ गया

बाँट लेते थे कभी  ग़म माँ से हम
फिर हँसी में ग़म उड़ाना आ गया

भूल से ग़म-ख़्वार मिल जाए अगर
हाथ में जैसे ख़ज़ाना आ गया

काश लौटा पाता वो बचपन कोई
याद वो हँसना- हँसाना आ गया

पड़ दरारें हैं गई दीवार में
ख़्वाहिशों को अब घटाना आ गया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर