आज कैसा ये ज़माना आ गया
झूठ को अब सच बनाना आ गया
हाल अपना अब नहीं कह पाते हैं
दर्द हमको भी छुपाना आ गया
बाँट लेते थे कभी ग़म माँ से हम
फिर हँसी में ग़म उड़ाना आ गया
भूल से ग़म-ख़्वार मिल जाए अगर
हाथ में जैसे ख़ज़ाना आ गया
काश लौटा पाता वो बचपन कोई
याद वो हँसना- हँसाना आ गया
पड़ दरारें हैं गई दीवार में
ख़्वाहिशों को अब घटाना आ गया
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X