आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गले से लगा लो

                
                                                         
                            भुलाकर मेरी तुम ख़ताएँ, मुझे तुम गले से लगा लो
                                                                 
                            
न चाहा तुम्हें हम रुलाएँ, मुझे तुम गले से लगा लो

ढलेगा न सूरज मुहब्बत का अपनी कभी भी सनम अब
है चाहत की दिल में शुआएँ, मुझे तुम गले से लगा लो

कभी दर्द बन कर नहीं, अब शिफ़ा बन के ही रहना हमको
सदा करता है दिल दुआएँ, मुझे तुम गले से लगा लो

लिपट कर तुम्ही से सभी दर्दों-ग़म हम भुला आज देंगे
सुनो दिल की मेरे सदाएँ, मुझे तुम गले से लगा लो

नहीं अब जुदा है तेरे-मेरे ख़्वाबों का संसार 'पारुल'
हुई ख़त्म हैं सब सजाएँ, मुझे तुम गले से लगा लो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
10 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर