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हाथों से रेत जैसे, मौका फिसल रहा है

                
                                                         
                            धरती सुलग रही है, आकाश जल रहा है
                                                                 
                            
गर्मी से अब हिमालय, पल-पल पिघल रहा है

सूखे नदी कुएँ भी, सूखे हैं सारे तालाब
धरती बना के सहरा, सूरज निगल रहा है

एक दिन यूँ होगा मुश्किल, तब साँस भी ले पाना
दोहन को रोकने में, इंसाँ विफल रहा है

ये प्रकृति कहीं बन, जाए न सबकी दुश्मन
सब जानकर, नहीं अब, भी कोई सँभल रहा है

है वक़्त तुम बदल लो, ख़ुद को अभी भी 'पारुल'
हाथों से रेत जैसे, मौका फिसल रहा है
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3 घंटे पहले

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