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बिछड़े अपने

                
                                                         
                            बिछड़े अपने,  रूह में मेरी समाते हैं
                                                                 
                            
चाह कर भी हम भुला उनको न पाते हैं

आज तक भी हम बिछड़ कर उनसे ज़िंदा है
जिस्म का क्यूँ बोझ हम अब भी उठाते हैं

ख़ामुशी की इस ज़ुबाँ में यादें हैं उनकी
यादों के ग़म रात-दिन हमको रुलाते हैं

महकी हैं उनकी ही ख़ुशबू से हवाएँ भी
आज भी उनको सदा हम पास पाते हैं

खो के उन माता-पिता को खोई जन्नत है
दिल को बीते वो ज़माने याद आते हैं
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5 घंटे पहले

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