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"उस पार मिलन"

                
                                                         
                            खोकर मुझको यदि प्रियतम,
                                                                 
                            
फिर पाने की चाह करोगे,
स्मृतियों के नीरव वन में,
मेरा ही आह्वान सुनोगे।

जब संध्या के धूमिल क्षण में,
मन का दीप अकेला होगा,
मेरे स्वर की मधुर प्रतिध्वनि,
मौन गगन में मेला होगा।

खो कर फिर तुम पा ना सकोगे!
यह विश्वास नहीं, वरदान;
प्रेम कभी खोता नहीं है,
हो जाता है अंतर्ध्यान।

मैं न रहूँगा पथ की धूलि में,
न दृग के सम्मुख आकार;
किन्तु तुम्हारे हृदय-कुंज में,
रहूँगा बन मधुमय झंकार।

जब जीवन की भीड़ अचानक,
तुमको तुमसे दूर करेगी,
मेरी स्मृति की शीतल छाया,
मन की तपन जरूर हरेगी।

हम वहाँ मिलेंगे प्रियतम,
जहाँ शब्द नहीं पहुँचेंगे;
जहाँ नयन के अश्रु स्वयं ही,
अनकहे अर्थों में ढलेंगे।

हम वहाँ मिलेंगे जहाँ तुम,
आ न सकोगे पथ पहचान;
जहाँ विरह का क्षीण अँधेरा,
बन जाएगा नव विहान।

तब तुम जानोगे—प्रेम नहीं,
केवल देहों का अनुबंधन;
वह तो दो आत्माओं के बीच,
अनश्वर प्रकाश का स्पंदन।
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एक घंटा पहले

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