किसे बदलना चाहता था मैं—
अपने को,
या उन दर्पणों को
जो हर बार मेरा नहीं,
किसी और का चेहरा
लौटा देते थे?
शायद परिवर्तन नहीं,
पहचान ही अब तक अधूरी थी।
भीड़ ने कहा—
"चलो, हमारे साथ;
यहीं स्वीकृति का उत्सव है।"
मैं चला भी,
किन्तु हर मोड़ पर
अपने ही पदचिह्न
मुझसे पूछते रहे—
"क्या यह पथ
सचमुच तुम्हारा था?"
तब जाना—
मौलिक होना
अलग दिखने का आग्रह नहीं,
अपने भीतर
उस प्रथम स्वर को पहचान लेना है,
जो जन्म से पहले ही
मेरे अस्तित्व में
निस्पंद धड़क रहा था।
परिष्कार
वृक्ष का पत्ते बदलना नहीं,
जड़ों का
और गहरे उतर जाना है।
जो भीतर से बढ़ता है,
उसे बाहर
नया होने का अभिनय
कभी नहीं करना पड़ता।
अब मैं
संसार से भिन्न होने के लिए नहीं,
स्वयं से अभिन्न होने के लिए
जीना चाहता हूँ।
यदि इस यात्रा में
मैं अकेला भी रह जाऊँ,
तो भी
अपने मौन का
सबसे विश्वसनीय सहचर
मैं स्वयं रहूँगा।
और तब जाना—
परिवर्तन कोई लक्ष्य नहीं,
आत्मा का स्वाभाविक प्रस्फुटन है।
जो स्वयं के स्वर में स्थित हो गया,
उसे समय बदलता नहीं;
वह स्वयं
समय के अर्थ बदल देता है।
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