चुना था मैंने दूर गगन में
एक आलोकित नक्षत्र-वृंद,
सोचा था—वहीं बसेगा सुख,
वहीं मिलेगा जीवन-छंद।
पर जब जागी चेतना मेरी,
टूटा मोहक स्वर्णिल जाल;
सामने खड़ी थी कर्मभूमि,
लिए समय का कठोर सवाल।
धूल भरे पथ, तीखे शिलाखंड,
पग-पग संघर्षों का विस्तार;
किन्तु वहीं से फूटा साहस,
वहीं मिला श्रम का उपहार।
तब समझा—स्वप्नों का वैभव
केवल दिशा का संकेत है;
जीवन का सच्चा सौंदर्य तो
कर्मों का जागृत गीत है।
जो नभ के आकर्षण से उतर
मिट्टी का स्पर्श स्वीकारे,
वही अंधेरों के बीच खड़ा
अपने भीतर दीपक धारे।
स्वप्न और सत्य के संगम में
जीवन का अर्थ प्रकट होता;
जब आकांक्षा श्रम से मिलती,
तब अंतर्मन कमल-सा खिलता।
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