जीवन ने मुझे आयु नहीं,
केवल भिन्न-भिन्न मौन दिए।
मैं उन्हें
वर्ष समझता रहा;
वे भीतर
स्वभाव के
अदृश्य संस्कार थे।
धीरे-धीरे जाना—
बाल्य
ज्ञान का आरंभ नहीं,
अहं का
प्रथम विसर्जन है।
यौवन भी
वेग नहीं,
अंतराग्नि को
दिशा देने की साधना है।
प्रौढ़ होने पर भी
न्याय नहीं आया,
जब तक
अपने ही पक्ष में खड़े
असत्य को
पहचान न सका।
तभी समझा—
विवेक
दूसरों का निर्णय नहीं,
स्वयं का परिष्कार है।
समय बीतता नहीं;
वह भीतर
स्वभाव तराशता है।
जो नहीं तराशा जाता,
वह वृद्ध तो होता है,
परिपक्व नहीं।
शायद
प्रज्ञा ही
समय का
मौन स्वर है।
अब मैं
जीवन को
आयु में नहीं,
परिवर्तन में पढ़ता हूँ।
हर सच्चा प्रश्न
मुझे विनम्र करता है;
हर उत्तर
थोड़ा और संशय।
शायद
यही साधना है।
अब
अंतिम सत्य की
प्रतीक्षा नहीं।
यदि प्रत्येक अवस्था
एक आवरण कम कर दे,
वही पर्याप्त है।
आत्मबोध
समय के पार नहीं,
'मैं' के पार जन्मता है।
जहाँ अहं मौन होता है,
वहीं चेतना
स्वयं का
प्रथम परिचय देती है।
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