सुख नहीं
दूरस्थ शिखर पर
ध्वजा-सा
फहराता रहता।
वह तो
थके पथिक के मन में
मौन नदी-सा
बहता रहता।
जितना उसको
मुट्ठी बाँधा,
उतना ही
वह दूर गया।
जब खोले
अंतर के कपाट,
निर्झर बन
स्वतः उतर आया।
इच्छाओं के
अश्व अनियंत्रित
धूल बहुत
उड़ाते हैं।
शांत क्षितिज पर
ठहरा सूरज
धीरे-धीरे
घर आता है।
कर्म अगर
पूजा बन जाए,
फल की चिंता
स्वयं पिघले।
दीपक जैसे
जलता रहता,
बिना कहे ही
तम को निगले।
समर्पण की
मृदु छाया में
मन पाता
अपना विस्तार।
जो वर्तमान को
हृदय लगाता,
उसी द्वार पर
ठहरे संसार।
सुख का पथ
चलकर नहीं,
ठहरकर
पहचाना जाता।
जिसने जीवन
सहज जिया है,
उसके भीतर
आनंद स्वयं
प्रभात बन
मुस्काता।
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