बहुत समय तक
मैं सुख को
अपने स्वप्नों के आकार से मापता रहा।
हर पूर्ण हुई इच्छा के पीछे
एक नई आकांक्षा खड़ी थी;
और मैं
अपने ही क्षितिज का
अंत खोजता रहा।
फिर जाना—
यथार्थ विरोधी नहीं,
मेरा मौन सहयात्री है।
वह हर बार
मेरे स्वप्नों को नहीं तोड़ता;
केवल उनकी सीमा का
परिचय देता है।
धीरे-धीरे
मैंने समझा,
प्राप्ति कभी अकेली नहीं आती।
उसके पदचिह्नों के साथ
किसी अनदेखे त्याग की
मृदुल धूल भी चलती है।
शायद यही
जीवन का अदृश्य विधान है।
तब प्रश्न बदला—
मैंने क्या पाया,
यह महत्त्वपूर्ण नहीं रहा।
मैंने किसे
सहज भाव से जाने दिया,
यही भीतर
एक नई शांति लिखने लगा।
अब इच्छाएँ
मुझे बाँधती नहीं;
वे केवल दिशा बताती हैं।
यात्रा का मूल्य
गंतव्य में नहीं,
उस विवेक में है
जो चयन और विरक्ति
दोनों को स्वीकार सके।
आज यदि सुख
कभी मेरे समीप ठहरता है,
तो किसी उपलब्धि की तरह नहीं।
वह उस शांत क्षण-सा आता है,
जब स्वप्न और यथार्थ
एक-दूसरे को बदलने का आग्रह छोड़,
मौन में
एक-दूसरे को स्वीकार कर लेते हैं।
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