मैं चल सकता था—
अभी, इसी क्षण,
उस दिशा की ओर
जिसे मेरी दृष्टि ने चुना था;
किन्तु मैंने अपने पथ के साथ
किसी और की धड़कन भी बाँध दी।
तब जाना—
यात्राएँ केवल पैरों से नहीं चलतीं,
वे समयों के बीच भी घटित होती हैं।
एक इच्छा यदि आगे बढ़ना चाहती है,
तो दूसरी को भी
अपने संकोचों से बाहर आना पड़ता है।
कभी-कभी प्रतीक्षा
स्थिरता नहीं होती,
वह दो मौन धाराओं का
एक ही नदी बनने का प्रयत्न होती है।
किन्तु कौन कह सकता है
कि सभी नदियाँ समुद्र तक साथ पहुँचती हैं?
मैंने कई बार सोचा है—
क्या पथ वास्तव में बाहर होता है,
या वह उन अदृश्य दूरियों में जन्म लेता है
जो दो चेतनाओं के बीच फैली रहती हैं?
शायद साथ चलना
एक मार्ग नहीं, एक प्रश्न है।
अज्ञात के इस विस्तृत प्रदेश में
न मुझे अंतिम दिशा ज्ञात है,
न किसी निश्चित गंतव्य का आश्वासन।
मैं केवल इतना देखता हूँ कि
अकेले कदम शीघ्र पड़ते हैं,
पर संगति की लय धीरे-धीरे बनती है।
इसलिए अब मैं
प्रतीक्षा को विलम्ब नहीं मानता।
यदि समय की दो अलग धाराएँ
कभी एक स्वर में बह सकें,
तो वही क्षण यात्रा का आरम्भ होगा—
और यदि नहीं, तो मौन भी एक मार्ग है।
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