मैंने पाया—
धन वस्तु नहीं,
एक चलती हुई छाया है।
जितना उसके पीछे गया,
उतना ही
अपने से दूर हुआ।
हाथ भरते रहे,
पर भीतर
एक अनाम रिक्ति
अस्पर्श रही।
मैंने सोचा था—
अभाव ही प्यास है;
फिर जाना,
प्यास का जन्म
अभाव से नहीं,
आसक्ति से होता है।
मरुस्थल बाहर नहीं था,
वह मेरे ही भीतर
धीरे-धीरे फैल रहा था—
इच्छाओं की धूप में,
अपेक्षाओं की हवा में।
तब एक दिन
मैंने संग्रह नहीं,
स्वयं को टटोला।
वहाँ एक मौन था—
निर्व्याज,
अकिंचन,
पर पूर्ण।
अब जानता हूँ—
समृद्धि का अर्थ
अधिक पा लेना नहीं,
उस बिंदु तक पहुँचना है
जहाँ पाने की आकुलता
स्वतः विलीन हो जाए।
और प्यास—
समुद्र से नहीं,
अपने ही भीतर
फूटते किसी निर्मल स्रोत से
शांत हो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X