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"प्राप्ति का आलोक"

                
                                                         
                            क्यों दौड़े
                                                                 
                            
दूर क्षितिज तक,
जहाँ धूप भी
छाया बन जाए?
द्वार तुम्हारे
उषा खड़ी है,
मन फिर भी
वन-वन भरमाए।

जिसे सहज कह
तुम टाल रहे हो,
वह कितने
युगों का संचय है।
अश्रु, तपस्या,
मौन प्रतीक्षा का
साकार हुआ
यह प्रत्यय है।

फूल न पूछे—
कितना पाया;
वह बस
सुगंध लुटाता है।
झुका हुआ
फलभरा तरु ही
धरती का
ऋण चुकाता है।

संतोष नहीं
निष्क्रिय ठहराव,
यह तो
अंतर का अनुशासन है।
जहाँ कृतज्ञता
दीपक बनती,
वहीं मनुष्य
स्वयं साधन है।

तृण में भी
वन का स्पंदन है,
बूँदों में
सागर की प्यास।
जिसकी दृष्टि
कृतज्ञ हुई है,
उसके लिए
कण-कण प्रकाश।

प्राप्ति कोई
वस्तु नहीं है,
वह चेतना का
उज्ज्वल विस्तार।
जिसने 'पर्याप्त' का
अर्थ समझा,
उसी के भीतर
उगा अपार।
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1 hour ago

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