बहुत दूर तक
मैंने जीवन को
उपलब्धियों में खोजा।
हर शिखर के बाद
एक और शिखर था;
रिक्तता फिर भी
मेरे साथ चली।
तब जाना—
मनुष्य का घर
दीवारों में नहीं होता।
एक आत्मीय मौन,
जो बिना शब्द
सुन ले—
वही सबसे दुर्लभ आश्रय है।
धीरे-धीरे
मैंने दूसरों की दृष्टि से
स्वयं को देखना छोड़ दिया।
भीतर का साक्षी
जब जागा,
प्रशंसा और उपेक्षा
एक ही ध्वनि बन गईं।
हर नया दिन
मुझे कोई उत्तर नहीं देता;
वह केवल
एक नया प्रश्न सौंपता है।
शायद सीखना
अपने ही निष्कर्षों से
मुक्त होना है।
अब स्मृतियाँ
पीछे नहीं बुलातीं।
वे केवल बताती हैं—
यात्रा बदलती रही,
यात्री भी;
पर खोज
अब भी शेष है।
आज पूर्णता
मुझे उपलब्धि नहीं लगती।
वह उस क्षण की तरह है
जब पाने की आकुलता
और खोने का भय
एक साथ मौन हो जाएँ।
शायद वहीं से
जीवन आरंभ नहीं होता—
केवल पहली बार
दिखाई देता है।
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