बहुत दिनों तक मैंने समझा—
प्रकाश ऊँचाइयों में रहता है।
फिर देखा, सबसे ऊँचे मंच पर भी
छाया पहले पहुँच जाती है।
मैं उसी छाया को
प्रकाश समझता रहा।
मैंने सत्य को नामों में खोजा;
वह मौन में बैठा रहा।
मैं जयघोष सुनता रहा,
चेहरे पढ़ता रहा,
और मौन में रखे ग्रंथ का
एक भी पृष्ठ न खोल सका।
धीरे-धीरे समझा—
जब तक प्रश्न जीवित था,
सब भीतर घटता था।
उत्तर मिलते ही दीवारें उठीं,
और मैंने उन्हें ही धर्म समझ लिया।
वंश प्रमाण बना,
प्रसिद्धि स्वर बनी;
ज्ञान चुपचाप
वहाँ से चला गया।
अब मैं गुरु नहीं खोजता।
मैं उस मौन को सुनता हूँ,
जो मेरी हर निश्चितता से
एक प्रश्न पूछता है।
शायद दीक्षा
उत्तर से नहीं,
संशय से जन्म लेती है।
भीड़ को विश्वास चाहिए,
चेतना को जिज्ञासा।
मैं नहीं जानता—
मनुष्य अपने उत्तरों से बना है,
या उन प्रश्नों से,
जो उसे अपने ही भीतर
अपूर्ण बनाए रखते हैं।
अब यदि कोई पूछे—
सत्य कहाँ है?
मैं किसी मंच, नाम या वंश की ओर नहीं,
अपने भीतर देखूँगा—
जहाँ सभी परिचय विलीन हो जाते हैं,
वहाँ केवल एक प्रश्न शेष रहता है—
जो उत्तर नहीं,
मुझे पढ़ता रहता है।
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