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"धुंधलकों के उस पार"

                
                                                         
                            मुख पर मधु की हँसी सजी,
                                                                 
                            
उर में पीड़ा मौन;
कैसा यह युग आ गया,
कैसा जग का गौण।

सजते स्वप्निल प्रासादों पर
रंगों का विस्तार,
पास गए तो झर पड़ा
सारा झूठा श्रृंगार।

इतना घना कोलाहल है,
मौन हुआ लज्जित;
अंतर की वीणा का स्वर
रह जाता वंचित।

हर उर में एकाकी संध्या,
हर नयनों में प्यास;
अधूरे अरमानों का वन,
मधुर व्यथा का वास।

कितने चन्द्रमुखी जीवन में
तम का गहन निवास,
कितने हँसते अधरों पर
अश्रु करें संन्यास।

निशि की नीरव बाहों में
स्मृतियाँ खोलें पंख,
सूने मन-आकाश पर
लिख जाएँ नव अंक।

बुझते दीपक की लौ में भी
स्वर्णिम स्वप्न असीम,
टूटे स्वर में गूँज उठे
जीवन का संगीत।

फिर भी टूटी डालों पर
नव कोंपल मुस्काए;
धुंधलकों के उस पार कहीं
पूर्ण प्रभात उग आए।
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3 घंटे पहले

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