आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"दर्पण के उस पार"

                
                                                         
                            आईना मुझसे नहीं,
                                                                 
                            
शायद उस व्यक्ति से प्रश्न करता है
जो कभी था—
या जिसे मैं अपना होना समझता रहा।

चेहरे पर उगी हुई समय की लिपि को
मैं पढ़ता हूँ बार-बार,
पर हर अक्षर के भीतर
एक और अनपढ़ अँधेरा खुल जाता है।

मैंने जिन पगडंडियों को
अपनी यात्रा का अर्थ माना था,
वे रेत पर लिखी हुई दिशाएँ निकलीं।
चलता रहा मैं,
और मार्ग मेरे पीछे
अपनी ही स्मृति मिटाता रहा।

यश आया,
जैसे किसी सूने घर में
क्षणभर के लिए धूप उतर आए;
फिर वही दीवारें, वही प्रतिध्वनि।
शब्दों ने बहुतों को सांत्वना दी होगी,
पर मेरे भीतर का मौन
अभी तक अनाथ है।

आज लौटकर देखता हूँ—
तो नगर भी अपरिचित है,
और उसका विस्मरण भी।
कौन किसे छोड़ गया था?
मैं शहर से बिछड़ा,
या शहर मेरे स्वप्न से?

मेरे अपने
मेरे होने का प्रमाण माँगते हैं,
और मैं स्वयं से पूछता हूँ—
क्या सचमुच कोई "मैं" था
जो इन वर्षों में खो गया?
या यह खोज ही भ्रम है,
और दर्पण के उस पार
कोई चेहरा कभी था ही नहीं—

केवल एक प्रश्न था,
जो जन्म से अब तक
मेरा रूप धरकर चलता रहा है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर