मैंने कब स्वयं को जाना था—
शायद उस दिन भी नहीं
जब उपलब्धियों के स्वर्णिम अक्षरों में
अपना नाम पढ़कर
मैंने उसे ही अपना परिचय मान लिया था।
अब सोचता हूँ,
क्या वह मैं था,
या प्रशंसाओं के जल पर तैरती
किसी क्षणभंगुर छवि का प्रतिबिंब?
अहंकार कभी उद्घोष नहीं करता,
वह तो मौन रहता है—
जैसे किसी गहन वन में
अदृश्य लता
धीरे-धीरे वृक्ष के प्राणों को लपेट ले।
मैं उसे अपना संबल समझता रहा,
और वह भीतर ही भीतर
मेरी दृष्टि को संकीर्ण करता रहा।
जिन समस्याओं से मैं जूझता रहा,
उनमें से कितनी वास्तव में बाहर थीं?
और कितनी
मेरी ही आकांक्षाओं की छाया थीं?
मैंने बार-बार शाखाएँ छाँटीं,
पर जड़ों तक उतरने का साहस
कभी संचित न कर सका।
तात्कालिक समाधान
कितने आकर्षक होते हैं—
वे पीड़ा को ढँक देते हैं,
पर उसके स्रोत को नहीं।
मानो किसी गहरे अंधकार पर
दीप का चित्र अंकित कर दिया जाए,
और उसे ही प्रभात समझ लिया जाए।
आज जब भीतर उतरता हूँ,
तो उपलब्धियों का समस्त कोलाहल
दूर कहीं विलीन हो जाता है।
शेष बचता है केवल एक प्रश्न—
यदि सब उपाधियाँ छिन जाएँ,
तो क्या मेरे अस्तित्व का कोई अर्थ
फिर भी शेष रहेगा?
उत्तर अभी भी नहीं मिला है।
किन्तु इतना अवश्य जान पाया हूँ कि
आत्मा का मूल्य
यश-अपयश से परे है।
वह तो उस मौन प्रदेश में निवास करता है
जहाँ मनुष्य
स्वयं को सिद्ध नहीं करता,
केवल स्वयं से साक्षात्कार करता है।
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