तप्त धरा की देहरी ऊपर,
आई बरखा की नव चेतना।
मिट्टी की सौंधी खुशबू ने,
हवाओं में घोली वेदना।
पत्ता-पत्ता झूम उठा है,
शाखें लचकती अमराई में।
हरी चुनरिया ओढ़ प्रकृति,
मुस्काती अपनी तरुणाई में।
दामिनी के नर्तन से अम्बर,
एक सजीला रूप दिखाता।
प्रियतम की बाहों में सिमटकर,
मन का मयूर हर्षित हो जाता।
चूड़ी-बिंदिया और हरी चुनर,
सावन का अनुपम रंग सजाती।
भीगी हवा की हर इक सरगम,
हृदय में प्रीति का दीप जलाती।
निस्वार्थ भाव से बरसती बूंदें,
परमेश्वर की करुणा दर्शातीं।
घटाएं बनकर शिव का संकल्प,
धरा की सदियों की प्यास बुझातीं।
कण-कण में है उस असीम का वास,
प्रकृति का पावन उत्सव यही सिखाता।
त्याग और नेह की यह अविरल धारा,
आत्मा को उस परमात्मा से मिलाता।
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