कितने दीप जलाए तुमने,
स्वयं धुआँ बनती रहीं।
सबको पथ आलोकित करती,
अपनी दिशा ही खोती रहीं।
किस असीम की खोज में तुम
स्वयं से ही अनजान रहीं?
जिसे खोजती रहीं जगत में,
वह अंतर की पहचान रही।
त्याग यदि केवल बंधन बन जाए,
वह पूजा कैसी होगी?
मौन अगर ही भाग्य बन जाए,
वह वाणी कैसी होगी?
अर्पण तब ही सार्थक होगा,
जब अंतर स्वाधीन रहे;
प्रेम वही, जो आत्मदीप का
नित्य आलोक अधीन रहे।
स्वर्ण-जटित ये सूक्ष्म शृंखलाएँ,
किसे विमुक्त करेंगी?
पंख बँधे हों यदि अंतर के,
उड़ान कहाँ भरेंगी?
घर-घर तुमने प्राण बसाए,
मन का द्वार कहाँ खुला?
सबको अपना आकाश दिया,
तुम्हारा गगन कहाँ मिला?
सुनो—
एक स्वर मौन के भीतर
अब भी तुम्हें पुकार रहा।
धूल तले सोया प्रतिबिंब
अपना ही द्वार निहार रहा।
दर्पण बाहर मत ढूँढ़ो,
वह नयनों के पार बसा;
जिसे जगत ने ढक रखा था,
वह चिर आलोक तुम्हीं में था।
तुम केवल संबंध नहीं हो,
न ही केवल अर्पण हो।
तुम वह निःशब्द चेतना हो,
जिससे जागे जीवन-स्वर।
बूँद नहीं—
सागर की स्मृति हो;
सीमा नहीं—
अनंत का घर।
अब न किसी स्वीकृति की चाह,
न अस्वीकार का भय हो।
अपने मौन की वीणा पर
स्वत्व-जागरण का लय हो।
जब पहचानोगी स्वयं को,
प्रश्न सभी विलीन होंगे;
तुममें ही तुम लौटोगी—
और समस्त दिशाएँ
दीपित हो जाएँगी।
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