कितनी आँखों के स्वप्न लिए,
वह चुपचाप चला करता है।
अपने भीतर के तूफ़ानों को,
मुस्कानों से ढका करता है॥
दायित्वों का बोझ लिए,
जब कंधे थकने लगते हैं।
तब भी उसके दृढ़ चरण,
कर्तव्य-पथ पर बढ़ते हैं॥
उसके हिस्से कम आते हैं,
विश्रामों के मधुर क्षण।
पर औरों की राहों में वह,
भर देता है नव स्पंदन॥
कितनी इच्छाएँ मौन हुईं,
कितने सपने सोए हैं।
पर उसके त्यागों के कारण,
कितने जीवन रोए नहीं हैं॥
वह दीपक-सा जलता रहता,
अपने ही तेल को खोकर।
पर उजियारा बाँटता जाता,
हर अँधियारे को धोकर॥
सबसे अधिक अकेला होकर,
सबका संबल बन जाता है।
जो स्वयं हेतु नहीं जीता,
वही जीवन को पाता है॥
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