काल-वलय से परे प्रतिष्ठित,
मौन, अनादि, अविकारी।
सीमातीत चिद्घन आलोक,
स्वयंप्रभ, स्वयं विहारी।
क्षर देहों के क्षणिक भवन में,
अक्षय दीप प्रकाशित है;
आदि-अंत से परे चेतना,
ब्रह्मस्वरूप प्रतिष्ठित है॥
जो बीत गया, वह लुप्त नहीं,
स्मृतियों में मुस्काता है।
कलियों की मृदु गंध बन,
नव वसंत जगाता है।
आज खिला जो जीवन-वृक्ष,
कल के बीज सँजोए है;
वर्तमान के प्रत्येक स्पंदन में,
अतीत अभी भी सोया है॥
वर्तमान की भीगी माटी,
भावी का आधार बनी।
मौन गर्भ में काल सँजोए,
स्वर्णिम प्रभातों की धनी।
कल कोई बाहर से कब आता?
आज उसी का रूप निखर;
बीजों की निस्तब्ध तपस्या,
बनती नव हरित प्रहर॥
समय-सरित बहती अविराम,
लहरों का अविरत विस्तार।
किन्तु अचल तट-सा आत्मतत्त्व,
देख रहा सब पारावार।
भूत, भविष्य और यह क्षण भी,
उसके सम्मुख एक समान;
जिसकी दृष्टि अखंडित रहती,
उसके लिए कहाँ अवसान॥
एक सूत्र में बँधे हुए हैं,
तीनों काल अनंत प्रवाह।
आत्म-सिंधु की निस्तरंगता में,
लय पाते क्षण अथाह॥
जहाँ न भूत, भविष्य, वर्तमान,
केवल चेतन का विस्तार;
वहीं आत्मा का मौन प्रकाश,
वहीं काल का होता पार॥
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