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उसे कोई अभाव पराजित नहीं कर सकता।

                
                                                         
                            जिसे खोजता रहा मैं
                                                                 
                            
भीड़ के बहरे शोर में,
वह कोई मुख नहीं था—
केवल एक ऐसी दृष्टि,
जो शब्दों के पहले जन्मे
समर्पण के मौन को पढ़ सके।
पर चारों ओर धुंध थी—
जहाँ आत्मा का उजास भी
स्वार्थ की आँखों में
केवल उपयोग भर दिखाई देता है।

पीढ़ियाँ चुपचाप जलती रहीं
अपनों की वेदियों पर,
और राख बनने तक
अपने होने का अर्थ टटोलती रहीं।
तब भीतर किसी अनाम स्वर ने पूछा—
"क्या यह त्याग था,
या प्रतिध्वनि की प्रतीक्षा?"
मैं देर तक मौन रहा;
क्योंकि सबसे कठिन प्रश्न
मनुष्य स्वयं से ही पूछता है।

फिर जाना—
निष्कामता किसी सौदे का नाम नहीं।
कर्तव्य वहाँ घटित होता है
जहाँ पाने और खोने की भाषा
एक साथ विलीन हो जाती है।
उसका लेखा
समय की धूल पर नहीं लिखा जाता;
वह किसी अदृश्य आकाश में
अनश्वर अक्षरों की तरह
स्वयं को सुरक्षित रखता है।

किन्तु यह भी उतना ही सत्य है—
सहन करना ही साधना नहीं।
जहाँ आत्मा अपने ही प्रकाश से
वंचित होने लगे,
वहाँ मौन भी अपराध बन जाता है।
अन्याय के सम्मुख झुक जाना
करुणा नहीं,
अपने ही अस्तित्व से
धीरे-धीरे अनुपस्थित हो जाना है।

अब मैं किसी प्रमाण की प्रतीक्षा में नहीं।
यदि संसार मेरी अग्नि को
राख समझकर लौट जाए,
तो भी मेरे भीतर
एक आकाश शेष रहेगा—
जहाँ मैं स्वयं का साक्षी हूँ।
वहीं जाना कि
आत्मबोध ही अंतिम आश्रय है;
और जो स्वयं में पूर्ण हो गया,
उसे कोई अभाव पराजित नहीं कर सकता।
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2 घंटे पहले

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