मेरे मन की जिज्ञासा,
मुझे कुरुक्षेत्र खींच लाई।
कहने को तो यहां,
धर्म युद्ध हुआ था।
सब नियम ताक पर रखकर,
अधर्म ही हुआ था।
यहां श्री कृष्ण जरूर थे,
बड़े बड़े योद्धा दोनों ओर थे,
अपनों का अपनों से वध हुआ था।
हाय विडंबना कैसी ?
कुरुक्षेत्र की धरती चीख रही है,
ऐसा कभी न हो,
जो यहां तक नौबत आए,
बड़ों का ही यह सब खोट है,
लालच से ही सब कुछ हुआ था।
कुरुक्षेत्र की धरती लाल पड़ी है,
चीख चीखकर कह रही है,
समझौता कर लेना,
अपनों से ना टकराना,
परिणाम भयंकर होते हैं,
यही घृणित दृश्य मेरे मर्म को छुआ था।
-चंद्र दत्त शर्मा
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