कविता – खिलौना
कोई न समझा, कोई न जाना,
मुझ खिलौने को किसी ने न जाना।
मतलब का है यह संसार सारा,
मुझ को बस एक खिलौना ही माना।।
कोई न समझा, कोई न जाना,
बस मैं हूं एक खिलौना इतना ही जाना।
न कोई इच्छा है न कोई ख्वाहिश,
जान होते हुए भी इंसान नहीं है माना।।
टूट कर बिखर जाता हूं कुछ पल के लिए,
क्यों किसी ने न माना क्यों नहीं है जाना।
इंसान होते हुए भी खिलौना क्यों है माना,
आज तक न समझा आज तक न जाना।।
आंखों से निकले मेरी गर आंसू,
बारिश की बूंदें है जग ने है जाना।
खेल कर मेरे अरमानों से निकल गया जमाना,
जैसे खेल कर खिलौने से खुश होता है जमाना।।
बड़ी बेरंग होती है जिंदगी खिलौने की,
बहुत देर से मैं समझा बड़ी देर में है जाना।
इंसान होते हुए भी खिलौना क्यों है माना,
आज तक न समझा आज तक न जाना।।
आज आ गई वो भी घड़ी है,
मौत दरवाजे पर आकर हो गई खड़ी है।
निकाल कर फेंक दिया हूं घर से बाहर,
कहकर पुराना, बेकार हो गया है खिलौना।।
कोई न समझा, कोई न जाना,
मुझ खिलौने को किसी ने न जाना।
मतलब का है यह संसार सारा,
मुझ को बस एक खिलौना ही माना।।
था एक जमाना वो भी, खिलाता था खिलौना,
किसी की आंखों का तारा था यह खिलौना।
हंसने पर हंसना रोने पर रोता था जमाना,
आज का दिन है नजरें फेर लेता है जमाना।।
कुछ पल के लिए याद आता है वो जमाना,
पल- पल आंखों से आंसू बनकर बहता है तराना।
सोच कर बड़ा होता है आज दुःख,
कितना बदल गया वो पुराना ज़माना।।
टूट कर बिखर जाता हूं कुछ पल के लिए,
क्यों किसी ने न माना क्यों नहीं है जाना।
इंसान होते हुए भी खिलौना क्यों है माना,
आज तक न समझा आज तक न जाना।।
- नन्ना कवि
राहुल भारद्वाज
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