हम गाँव से शहर पढ़ने आ गए,
अपनी मुस्कान को शहर के नाम किए।
कुछ मसलों ने, कुछ सवालों ने, कुछ जवाबों ने, कुछ परिणामों ने,
हमसे हमारी ही मुस्कान छीन ली।
शहर इतना बेपरवाह होगा,
हमने सोचा भी नहीं होगा।
फिर भी हर शाम,
कुछ सवाल उभर आते हैं,
हमें हमसे हर वक़्त मुस्कुराने की कीमत मांगते हैं,
या यूँ कहें, हम पर एहसान करते हैं मुस्कुराते रहने का।
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