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बेताब निगाहें न जाने कब सुकुन पायेंगी

                
                                                         
                            बेताब निगाहें न जाने कब सुकुन पायेंगी
                                                                 
                            
ये बे-दिली न जाने क्या रंग लायेगी!
सर्द हवा के झोंकों ने भी रुख़ बदल लिया
बेखबर से कदम न जाने कब मंजिल पायेंगे।

मैं जानता हूॅं तू पास नहीं है
नज़रों को फिर भी इंतजार रहता है
न जाने कब कौन-सा हवा का झोंका
आ जाये तेरे पायल की खनक जिस पे।

चश्मे-साकी से जो जाम पीया
कहाॅं उतरा नशा उसका अब तक
बस हमें बदनाम किया
न थे हम दीवाने , फिर भी ये नाम दिया
हाय, राह में हमसफर ने दामन थाम लिया
हमने उसे चश्मे- साकी का नाम दिया।
-नाग मणि
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17 घंटे पहले

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