मेरी मंज़िल है कहाँ
चल पड़ा हूँ मैं अकेला,
रास्तों की भीड़ में,
हर तरफ़ मंज़िल के चर्चे हैं,
पर मेरी मंज़िल है कहाँ?
किसी ने कहा—
“उस मोड़ के आगे जाना,
वहीं शायद मिल जाए
तेरे सपनों का ठिकाना।”
मैं चला…
मगर उस मोड़ के आगे
फिर एक नया मोड़ मिला,
और हर मोड़ पर
एक नया सवाल मिला—
मेरी मंज़िल है कहाँ?
कभी लगा
मंज़िल बहुत पास है,
बस हाथ बढ़ाऊँ
और छू लूँ उसे;
मगर जैसे ही हाथ बढ़ाया,
वह धूप की तरह
फिसल गई हथेलियों से।
कभी भीड़ में चला,
कभी अकेले चला,
कभी अपनों के साथ चला,
कभी अपने ही साए से
बातें करता चला।
कई चेहरे मिले राहों में,
कुछ साथ चले,
कुछ बीच राह में छूट गए,
कुछ ने रास्ता बताया,
कुछ रास्ता बदल गए।
और मैं…
हर बार अपने भीतर झाँककर
बस इतना पूछता रहा—
आख़िर मेरी मंज़िल है कहाँ?
मैंने ऊँची इमारतें देखीं,
महँगे शहर देखे,
नाम के पीछे भागते लोग देखे,
तालियों के लिए जीते लोग देखे।
सोचा—
शायद मंज़िल
यही है!
फिर एक दिन
खामोशी में बैठा तो जाना—
जिसे पाने के लिए
मैंने इतना कुछ खो दिया,
वह मंज़िल नहीं थी,
वह तो बस
एक और पड़ाव था।
अब समझ आया है
कि मंज़िल शायद
किसी नक्शे पर नहीं होती,
न किसी शहर के नाम में,
न किसी ऊँची कुर्सी पर,
न किसी बड़ी उपलब्धि के दाम में।
मंज़िल तो शायद
उस पल का नाम है
जब आदमी
अपने भीतर के आदमी से
मिल लेता है।
जब थका हुआ मन
खुद से कह सके—
“हाँ,
अब मुझे किसी और रास्ते की
तलाश नहीं।”
शायद मेरी मंज़िल
वहीं है
जहाँ मेरे सपनों को
किसी प्रमाणपत्र की ज़रूरत न हो,
जहाँ मेरी मुस्कान
किसी और की स्वीकृति की
मोहताज न हो।
जहाँ मैं
हारकर भी टूटूँ नहीं,
जीतकर भी बदलूँ नहीं,
और चलते-चलते
अपने होने का अर्थ
समझ जाऊँ।
इसलिए अब
मैं मंज़िल पूछता नहीं,
बस चलता हूँ…
क्योंकि शायद
ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच यही है—
मंज़िल कहीं बाहर नहीं,
वह तो उस सफ़र में छिपी है
जिसे हम जीते हुए
अक्सर समझ ही नहीं पाते।
और अगर कोई फिर पूछे—
“कहाँ जाना है?”
तो मैं मुस्कुराकर कहूँगा—
“पता नहीं मेरी मंज़िल है कहाँ,
मगर इतना यक़ीन है—
मैं जिस दिन
अपने आप तक पहुँच जाऊँगा,
उस दिन समझूँगा…
कि मंज़िल यहीं थी,
बस मैं ही
उसे बाहर खोजता रहा।”
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