मैं दो आशंकाओं के बीच उलझा हूँ
तुम्हें एक बार फिर देख पाने की,
या फिर कभी न देख पाने की।
और मैं नहीं जानता
कि इन दोनों में से
मुझे किसका भय अधिक है।
यदि तुम फिर मिल गए,
तो शायद मैं
तुमसे कुछ कह नहीं पाऊँगा।
वे सारी बातें
जो इतने दिनों से
मन में सँभालकर रखी हैं,
तुम्हारे सामने आते ही
शायद अपना रास्ता भूल जाएँगी।
मैं तुम्हें देखूँगा
और सोचूँगा
कि क्या तुम्हें भी
कभी मेरी याद आई थी,
क्या किसी अनजान-सी शाम
तुम्हारा मन भी
मेरे पास लौटना चाहता था।
लेकिन यदि तुम नहीं मिले,
तो मेरे पास
जीवन भर के लिए
कुछ प्रश्न बच जाएँगे
क्या तुम अब भी वैसे ही हँसते हो?
क्या तुम्हें अब भी
वह सब याद है
जिसे मैं भूलने की
कितनी ही कोशिश कर चुका हूँ?
क्या तुम्हारे जीवन में
अब कोई ऐसा है
जिसके सामने तुम
बिना कुछ छिपाए
अपने मन की बात कह देते हो?
और क्या कभी
किसी बात पर हँसते हुए
तुम्हें अचानक मेरा ध्यान आता है?
मुझे डर है
कि यदि तुमसे फिर मिला,
तो तुम्हें बदल चुका पाऊँगा
और अपने भीतर
तुम्हारी पुरानी स्मृति को
टूटते हुए देखूँगा।
और यदि कभी नहीं मिला,
तो शायद उसी स्मृति को
सच मानकर
जीवन भर सँभाले रहूँगा।
कितना विचित्र है
तुम्हारे सामने आने का भय भी
तुमसे जुड़ा है,
और तुम्हारे सामने
कभी न आने का भय भी।
शायद मैं तुम्हें फिर देखना चाहता हूँ,
लेकिन उस दिन से डरता हूँ
जब तुम्हें देखकर
मुझे यह स्वीकार करना पड़ेगा
कि तुम अब मेरे लिए
वही व्यक्ति नहीं रहे,
जिसे मैंने अपनी स्मृतियों में
इतने वर्षों से सँभाल रखा है।
और शायद
यही मेरी सबसे बड़ी उलझन है
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