काश बचपन लौट आता,
खुशहाली का मंजर दौड़ आता!
एक पल रूठते फिर मुस्कुराते
गम के निशान दिल पर न रहते,
सब सपने अपने रहते!
एक दूसरे का दर्द सहते
दुश्मनी का खंजर तोड़ आता
काश बचपन लौट आता!•••
गलियों मे चहल- पहल करते
लोग मुझे प्यार करते, मन न उदास होते!
बे- खौफ नींद सोते,
कागज की नाव बहाते, गुलाला उड़ाते
लुका छिपी खेल-खेलते , मस्त रहते
जिंदगी से कड़वाहट तोड़ जाता!
काश बचपन लौट आता!•••
उदासी न अवसाद आता,
झगडा़ न फसाद होता
अमन चैन सुकून होता
मस्ती मे मगन होकर, अहंकार छोङ आता!
काश बचपन लौट आता,
खुशहाली का मंजर दौड़ आता!•••
मोहन त्रिपाठी
रीवा, मध्यप्रदेश
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