कुबेर सा खजाना उसका
पर संतुष्टि नहीं है
छत्तीस व्यंजन थाली में
पर संतुष्टि नहीं है
भर रहे बक्से पोशाक से उसके
पर क्या करे भाई कपड़े ही नहीं है
जरूरत तो बूंद की
पर सागर को ढूंढता है
मिल गया सागर तो
प्यास बुझती ही नहीं है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X