अगर अलसाती सुबह की हस्ती को
बारिश से नहाती मिट्टी को
दोपहरी फुर्सत की उस झपकी को
ऊँचे पहाड़ों की खूबसूरत बस्ती को
बर्फ पर लोट कर बुलाती हर उस मस्ती को
समंदर से आवाज़ लगाती कश्ती को
जो इंतज़ार है तुम्हारी छुट्टी का
तो नाम ना देना अपने होने को ज़िंदा होने का
हाँफती सी इस दौड़ को ज़िंदगी जीने का
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