काश तू समझे कि मैं ही तो आख़िर था तेरा,
तू नहीं था तो यार, जीवन में आख़िर क्या था मेरा?
तेरे बिन ना दिल की धड़कन, ना साँस चलती सीने में,
तेरे बिन ख़ुशियाँ भी मेरी, ख़ुशियाँ ना लगती जीने में।
भीड़ तो है चारों तरफ़, पर सूना हर एक रास्ता है,
मेरी हर एक मुस्कुराहट का, तुझसे ही तो वास्ता है।
पत्थर बन के रह गया हूँ मैं वक़्त के इस आईने में,
तेरे बिन ख़ुशियाँ भी मेरी, ख़ुशियाँ ना लगती जीने में।
रूठ कर तुझसे बता मैं, भला कहाँ जा पाऊँगा?
तू जो अगर ना मिला मुझे, तो ख़ुद में ही मिट जाऊँगा।
कोई मरहम काम ना आए, इश्क़ के इस पसीने में,
तेरे बिन ना दिल की धड़कन, ना साँस चलती सीने में।
लौट आ अब छोड़ के ज़िद, वक़्त ये गुज़र न जाए कहीं,
तेरे सिवा इस पागल दिल को, अब कुछ भी तो भाए नहीं।
काश तू समझे कि मैं ही तो आख़िर था तेरा,
तू नहीं था तो यार, जीवन में आख़िर क्या था मेरा?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X